____भारतीय ज्ञान परंपरा____
वैसे तो ज्ञान शब्द knowledge का हिंदी रूपांतरण है, जो कि हम सभी के पास थोड़ा बहुत है, लेकिन भारतीय ज्ञान प्रणाली का पूरी दुनिया में अपना एक खास महत्व है। भारतीय ज्ञान परंपरा एक अति प्राचीन वेदों से नि:सृत ज्ञान की एक अविरल धारा है जो भारतीय जनमानस में प्रवाहित होती है और जो हृदयगत एवं आत्मगत है, उसका कोई बनावटी स्वरूप नहीं है। वेद शब्द विद् धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ होता है जानना। यह परंपरा आगे बढ़ती हुई गुरु-शिष्य परम्परा और गुरुकुल पद्धति के माध्यम से हमारी संस्कृति का एक सर्वश्रेष्ठ अंग बनी जिसमें यह माना जाता है कि विद्यादान सर्वश्रेष्ठ दान है। भारतीय मनिषियों द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखे गए ग्रंथ इस ज्ञान परंपरा को अक्षर बनाए रखने में मिल के पत्थर हैं। हमारी ज्ञान परंपरा में धर्म और दर्शन का अद्भुत समन्वय है। विज्ञान और अध्यात्म का भी अद्भुत समन्वय है अर्थात जो भी विज्ञान है वह आध्यात्मिक आधारित है। यहां अध्यात्म हमें यह बताता है कि विज्ञान का प्रयोग कैसे और क्यों करें, कहां करें। नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम आध्यात्मिक विहीन विज्ञान के उदाहरण हैं। हमारे ज्ञान परंपरा में प्राचीन काल से ही योग परंपरा और आयुर्वेद अत्यंत समृद्ध रहा है। गणित, आयुर्वेद ज्ञान, पशुपालन, राजनीति, विधि एवं नीति शास्त्र, प्रकृति एवं पर्यावरण, पक्षियों से संबंधित भाषण, वृक्षारोपण के धार्मिक महत्व, स्थापत्य कला एवं नाट्य शास्त्र, क्रीड़ा एवं मनोरंजन, कामशास्त्र संबंधित विषयों की भरमार है जिसका रखरखाव, पुनर संपादन एवं संकलन अति आवश्यक है। हमारे प्राचीन ग्रंथो में ऐसे पुष्पक विमान की महिमा है जो कभी बीच में क्रश नहीं होती थी। आवश्यकता है उसे वैज्ञानिक तकनीकी तक पहुंचाने की। आर्यभट्ट द्वारा किया गया सुनने का आविष्कार, चरक और सुश्रुत का चिकित्सा विज्ञान, नागार्जुन का रसायन शास्त्र, ब्रह्मगुप्त और आर्यभट्ट द्वितीय का खगोल विज्ञान और गणित में जो योगदान है वह हमारी ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कम नहीं है। आवश्यकता है इन प्राचीन ग्रंथो का पुनर अध्ययन करने का और उसे और उसके नवीन दृष्टिकोण को खोजने के प्रयास का। पारंपरिक ज्ञान और जीवन मूल्य भी भारतीय ज्ञान परंपरा का एक अभिन्न अंग है। क्या पारंपरिक ज्ञान कुछ समुदाय के जीविकोपार्जन का साधन भी है। पारंपरिक ज्ञान की रक्षा के लिए विकसित और व्यापक दृष्टिकोण अपनाए जाना हमारे ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में अत्यंत मददगार साबित होगा। इन सभी के भीतर मनुष्यता का ज्ञान संपादित करना हमारे ज्ञान परंपरा का मूल एवं मूल्य है।
डॉ. सरिता चौहान
गोरखपुर उत्तर प्रदेश